गाँव का हरामी साहूकार – लालाजी 4

खैर, आज जब लालजी antarvasna ने अपना बही ख़ाता खोला kamukta तो उन्होने पाया की रामदीन ने जो पैसे उधार लिए थे, उसका सूद नही आया है अब तक…
रामदीन दरअसल पिंकी का पिता था..
बस , फिर क्या था…
लालजी की आँखो में एक चमक सी आ गयी..

उन्होने झत्ट से अपना लट्ठ उठाया, दुकान का शटर नीचे गिराया और चल दिए पिंकी के घर की तरफ..

वहां पहुँचकर उन्होने दरवाजा खटकाया पर काफ़ी देर तक कोई बाहर ही नही निकला…
एक पल के लिए तो लालजी को लगा की शायद अंदर कोई नही है…
पर तभी उन्हे एक मीठी सी आवाज़ सुनाई दी..

”कौन है….”

लालाजी के कान और लंड एकसाथ खड़े हो गये…
ये पिंकी की आवाज़ थी.

वो अपने रोबीले अंदाज में बोले : “मैं हूँ …लाला…”

अंदर खड़ी पिंकी का पूरा शरीर काँप सा गया लालाजी की आवाज़ सुनकर…
दरअसल वो उस वक़्त नहा रही थी…

और नहाते हुए वो सुबह वाली बात को याद करके अपनी मुनिया को मसल भी रही थी की कैसे उसने और निशि ने मिलकर लालाजी की हालत खराब कर दी थी…
और अपनी चूत मसलते हुए वो ये भी सोच रही थी की उसकी नंगी गांड को देखकर लालाजी कैसे अपने खड़े लंड को रगड़ रहे होंगे…
पर अचानक दरवाजा कूटने की आवाज़ ने उसकी तंद्रा भंग कर दी थी..
काफ़ी देर तक दरवाजा पीटने की आवाज़ सुनकर वो नंगी ही भागती हुई बाहर निकल आई थी क्योंकि उसके अलावा घर पर इस वक़्त कोई नही था..
उसके पिताजी खेतो में थे और माँ उन्हे खाना देने गयी हुई थी..

पिंकी के शरारती दिमाग़ में एक और शरारत ने जन्म ले लिया था अब तक..

पिंकी बड़े सैक्सी अंदाज में बोली : “नमस्ते लालाजी …कहिए…कैसे आना हुआ…”

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लालाजी ने इधर उधर देखा, आस पास देखने वाला कोई नही था…

वो बोले : “अर्रे, दरवाजा बंद करके भला कोई नमस्ते करता है…दरवाजा खोल एक मिनट…. बड़ी देर से खड़का रहा हूँ, तेरे पिताजी से जरुरी काम है ”

पिंकी : “ओह्ह …लालाजी …माफ़ करना…पर..मैं नहा रही थी…दरवाजे की आवाज़ सुनकर ऐसे ही भागती आ गयी…नंगी खड़ी हूँ , इसलिए दरवाजा नही खोल रही…एक मिनट रूको..मैं कुछ पहन लेती हूँ …”

उफफफफ्फ़…..
एक तो घर में अकेली…
उपर से नहा धोकर नंगी खड़ी है….
हाय ….
इसकी इसी अदाओं पर तो लालाजी का लंड उसका दीवाना है…

उसने ये सब दरवाजे के इतने करीब आकर, अपनी रसीली आवाज़ में कही थी की दरवाजे के दूसरी तरफ खड़े लालाजी का लंड उनकी धोती में खड़ा होकर दरवाजे की कुण्डी से जा टकराया…

लालाजी दम साधे उसके दरवाजा खोने का इंतजार करने लगे..

एक मिनट में जब दरवाजा खुला तो पिंकी को देखकर उनकी साँसे तेज हो गयी….
वो जल्दबाज़ी में एक टॉवल लपेट कर बाहर आ गयी थी…
उसने सिर्फ टॉवल पहना हुआ था और कुछ भी नही…
और उपर से उसके गीले शरीर से पानी बूंदे सरकती हुई उसके मुम्मों के बीच जा रही थी..

लालाजी का दिल धाड़-2 करने लगा..वो उनके सामने ऐसे खड़ी थी जैसे ये पहनावा उसके लिए आम सी बात है, पर अंदर से वो ही जानती थी की उसका क्या हाल हो रहा है पिंकी : “हांजी लालाजी ,आइए ना अंदर…बैठिये …”

लालाजी अंदर आ गये और बरामदे में पड़ी खाट पर जाकर बैठ गये…
उनकी नज़रें पिंकी के बदन से ही चिपकी हुई थी…
आज वो सही तरह से उसके शरीर की बनावट को देख पा रहे थे…

पिंकी की कमर में एक कटाव पैदा हो चुका था जो उसके रसीले कुल्हो की चौड़ाई दर्शाते हुए नीचे तक फैलता हुआ दिख रहा था…
ब्रा तो वो पहले भी नही पहनती थी इसलिए उसकी गोलाइयों का उन्हे अच्छे से अंदाज़ा था…
करीब 32 का साइज़ था उसके गुलगुलो का..
और उनपर लगे कंचे जितने मोटे लाल निप्पल….
उफफफ्फ़..
उनकी नोक को तो लालजी ने कई बार अपनी आँखो के धनुषबान से भेदा था..

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पिंकी : “लालाजी …पानी…..ओ लालाजी …..पानी लीजिए….”

लालाजी को उनके ख़यालो से, लंड के बाल पकड़ कर बाहर घसीट लाई थी पिंकी, जो उनके सामने पानी का ग्लास लेकर खड़ी थी..

नीचे झुकने की वजह से उस कॉटन के टॉवल पर उसकी जवानी का पूरा बोझ आ पड़ा था…
ऐसा लग रहा था जैसे पानी के गुब्बारे, कपड़े में लपेट कर लटका दिए है किसी ने…
और उनपर लगे मोटे निप्पल उस कपड़े में छेद करके उसकी जवानी का रस बिखेरने तैयार थे…

पर इन सबसे अंजान बन रही पिंकी, भोली सी सूरत बना कर लालाजी के पास ही बैठ गयी और बोली : “पिताजी तो शाम को ही मिलते है लालाजी , आपको तो पता ही है…और माँ उनके लिए खाना लेकर अभी थोड़ी देर पहले ही निकली है…घंटा भर तो लगेगा उन्हे भी लोटने में …”

लालाजी को जैसे वो ये बताना चाह रही थी की अगले एक घंटे तक वो अकेली ही है घर पर …

लालाजी ने उसके गोरे बदन को अपनी शराबी आँखो से चोदते हुए कहा : “अर्रे, मैं ठहरा व्यापारी आदमी, मुझे क्या पता की कब वो घर पर रहेगा और कब खेतो में …मुझे तो अपने ब्याज से मतबल है…आज ही देखा मैने, 20 दिन उपर हो चुके है और ससुरे ने ब्याज ही ना दिया…”

लालाजी अपनी आवाज़ में थोड़ा गुस्सा ले आए थे…
पिंकी ने तो हमेशा से ही उनके मुँह से मिठास भरी बातें सुनी थी…
इसलिए वो भी थोड़ा घबरा सी गयी…

वो बोली : “लालाजी …इस बार बापू ने नयी मोटर लगवाई है खेतो में, शायद इसलिए पैसो की थोड़ी तंगी सी हो गयी है….”

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वैसे तो उसका सफाई देने का कोई मतलब नही था पर लालाजी ताड़ गये की उसे अपनी फैमिली की कितनी चिंता है…

लालाजी : “देख पिंकी, तेरा बापू मोटर लगवाए या मोटर गाड़ी लेकर आए, मेरे पैसे टाइम से ना मिले तो मैं कुछ भी कर सकता हूँ …”

लालाजी का ये रूप देखकर अब पिंकी को सच में चिंता होने लगी थी…
उसने सुन तो रखा था की लालाजी ऐसे लोगो से किस तरह का बर्ताव करते है पर ये नही सोचा था की उसके बापू के साथ भी ऐसा हो सकता है…

उसने लालाजी के पाँव पकड़ लिए : “नही लालजी…आप ऐसा ना बोलो…मेरा बापू जल्दी ही कुछ कर देगा…आप ऐसा ना बोलो…थोड़े दिन की मोहलत दोगे तो वो आपके सूद के पैसे दे देंगे..”

लालाजी ने उसकी बाहें पकड़ कर उपर उठा लिया….
उस नन्ही परी की आँखो में आँसू आ रहे थे..

लाला : “अर्रे…तू तो रोने लगी…अर्रे ना….ऐसा ना कर…..मैं इतना भी बुरा ना हू जितना तू सोचन लाग री है”

बात करते-2 लालाजी ने उसे अपने बदन से सटा सा लिया…
उसके जिस्म से निकल रही साबुन की भीनी -2 खुश्बू लालाजी को पागल बना रही थी…
पानी की बूंदे अभी तक उसके शरीर से चो रही थी…
लालाजी की धोती में खड़ा छोटा पहलवान एक बार फिर से हरकत में आया और उसने अपने सामने खड़ी पिंकी को झटका मारकर अपने अस्तित्व का एहसास भी करवा दिया..

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